Saturday, January 10, 2009

शहरों की दास्ताँ

एक शहर ऐसा भी था
जहाँ चमचमाती रोशनी तो थी
पर अँधेरी ज़िन्दगी थी
जहां भीड़ में हर इंसान गुम हो चुका था
जहाँ दर्द, प्रेम जैसी भावनायें विलुप्त हो गयी थी
सिर्फ नकली चकाचोंधनी थी

एक शहर ऐसा भी था,
जो अपनेआप में जी रहा था
जाती संप्रदाय के झगडों में लोट-पोट हो रहा था
जहाँ भाषा एक अभिशाप बन रही थी
जहाँ प्यार होते हुए भी अलगाव था


एक शहर ऐसा भी था,
जो अपनी छवि सुधारने मे लगा था
जहाँ परस्पर प्यार तो था
पर राजनैतिक वातावरण छाया था
जहाँ माँगे हुए वोटो का असर कभी दिखता ही नही था

हर शहर में, एक अलग भीड़ नज़र आती है
हर शहर अपनी दास्तां खुद लिखता है
कोई गुलाल के रंगो में रंगा हैं
तो कोई खून की होली खेल रहा है
कोई जाति के दंगे फ़साद झेल रहा है
तो कोई बाबरी मज़्ज़िद के मुद्दे उखेड़ रहा है

शहर क्या होता है- हम लोगो का बसेरा
हम लोगों का डेरा
हम ही शहरों को आबाद करते हैं
और हम ही इन्हें बर्बाद कर देते हैं
हम वो गंदगी फैलाते हैं, जिन्हे चन्द लोग सिर्फ़ मन में सॉफ करते हैं

करना होगा , आगे बढ़ना होगा
एक नई सुबह का नही-अभी और आज में जीना होगा
वो प्यार फलाना होगा
जहाँ कोई जाति नही....कोई मज़हब नही....कोई भाषा नही...
सिर्फ़ प्यार का साम्राज्य होगा
ऐसे शहर को मिलकर हमे बनाना होगा
- वाणी मेहता

2 comments:

  1. Pratik PriyadarshiApril 16, 2011 at 9:15 PM

    What comes out in the first view is the fact that the shy, soft spoken Vani has a lot to say !
    Her entire perspective of looking at the broader picture has amazed me - she is so clear about the vision.
    Keep it Vani, and may your tribe increase.

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  2. Very thoughtful and provoking for goodness...

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