Tuesday, March 20, 2012

गर्भ शिशु की आवाज़

मैं एक छोटा सी कली, एक छोटा सा बीज हूँ
इस अद्भुत दुनिया में आने को बेताब हूँ
तुम्हारे सपनों को पूरा करने का आधार हूँ,
तुम्हारे ही पानी से सींचा गया हूँ।

जगह बहुत छोटी सी है, खुद को समेट बैठा हूँ मैं,
कुछ समझ ना आये,ना जाने कहाँ रहता हूँ मैं।
तुम मुझे प्यार करती हो, नहीं पता मुझको,
पर अद्भुत एहसास दिलाती हो, यह महसूस होता मुझको।

मैं डरता हूँ,जब तुम चिल्लाती हो,
खुश होता हूँ, जब मुस्कुराती हो,
शांत होता हूँ, जब कोई मंत्र पढ़ जाती हो
हैरान होता हूँ, जब अनभिज्ञ आवाज़े सुनाती हो।

मुझे दुनिया अपनी नज़रों से तुम दिखाती हो,
मेरे लिए ना जाने कितने दर्द सह जाती हो।
यह महसूस कर खुश होता हूँ मैं,
तुम्हारे आँचल में खेलने को बेताब हूँ मैं।

तुम जननी मेरी, शिशु तुम्हारा हूँ,
मैं तुम्हारे जीने का सहारा हूँ।
मैं वो नींव हूँ, जो जन्म कोख में लेती है,
निर्माण तुम्हे करना है,इसलिए दुनिया में जन्म लेती है।

Sunday, February 12, 2012

मैं समय हूँ - ना रुका हूँ, ना रुकता कभी
बस चलता हूँ, चलता रहूँगा यूहीं

अगर मैं इतिहास हूँ,
तो वर्त्तमान और भविष्य भी मैं ही हूँ
हर पल, हर समय एक जीवन जीता हूँ
मैं कल होकर भी आज को बनता हूँ
और आज होकर भी, कल बन जाता हूँ
मैं एक पहिया हूँ, जो रुकता ना कभी
बस चलता हूँ, चलता रहूँगा यूंही

मैं किसी के लिए नहीं रुकता
न मुझे कोई रोक सका है
मैं किसी के साथ नहीं चलता
न कोई मुझे पीछे छोड़ आगे चल सका हैं
जो मुझे जीत लेते हैं, वो मंजिल पा जाते हैं
जो मुझसे हार जाते हैं, वो मिटटी में मिल जाते हैं

चाहो तो मेरा दामन थामे, तुम मंजिल पा जाओ
चाहो तो छोड़ कर मुझे, तुम राह भटक जाओ
पाना चाहो विजय मुझ पर अगर
तो चलो सशक्त नियमों पर
ना पाना चाहो, तो चलो दिशाहीन राह पर

मैं अनमोल हूँ,
मैं अमिट हूँ, और अजय भी
मैं आधार हूँ, और साकार भी
ना रुका हूँ, ना रुकता कभी
बस चलता हूँ, चलता रहूँगा यूहीं

Friday, April 22, 2011

ज़िन्दगी एक अधूरी किताब है …..
पन्ने उसके वक़्त की स्याही से लिखे जातें है ,
कुछ इतने गहरे की छाप छोड़ जातें है ,
और कुछ वक़्त के साथ धुंधले पड़ जातें है .

कुछ पन्ने ऐसे होते है , जिन्हें याद कर हम मुस्कुराते है ,
जिनके सहारे हम मुश्किल वक़्त भी आसानी से जी लेते है .
कुछ पन्ने ऐसे होते है , जो अनकहे रिश्तों का अहसास करातें है ,
नहीं नाम उन रिश्तों का , पर यादों में अक्सर वो आते है ।

कुछ पन्ने ऐसे होते है , जो सिर्फ लिखने वाले के होते है ,
जिसपर किसी का हक़ नहीं होता , जिससे हर कोई अनजान होता है ।

ज़िन्दगी रहते कोई किताब पूरी नहीं होती ,
गुज़रा वक़्त ही दास्तान लिखता है ,
आने वाला कल सिर्फ इंतज़ार करता है ,
उस अधूरी किताब के पूरे होने का .

जिस दिन किताब पूरी होगी ,
अंत होगा उस लेखक के जीवन का ,
जीवित रहेगी - तो सिर्फ खट्टी मिट्ठी यादें ,
और उन यादों के रूप में - वो किताब .

Saturday, April 2, 2011

बिल्ली मौसी

बिल्ली मौसी देखो प्यारो कितनी है प्यारी
आने से पहले पर्मिसिओं लेकर ही अन्दर आती
आती है तो सबकुछ उल्टापुल्टा करके जाती
बनता हुआ काम बिगाड़ कर इठलाकर चली जाती

उसकी दो चमकीली आँखें कितनी है प्यारी
लेकिन अन्धेरें में हमको इससे है डराती
काली बिल्ली, सफ़ेद बिल्ली, जैसी भी हो बिल्ली
बिल्ली तो बिल्ली होती है, न वो सगी किसी की


म्याऊँ म्याऊँ करके वो पूछे - क्या मैं अन्दर आ जाऊं
आने के बाद वो चाहे अब मैं सबकुछ खा जाऊं
खाने के बाद वो चाहे अब मैं उसे पाचाऊँ
पचने के बाद वो चाहे जल्दी से सो जाओं

चूहे को देखे तो बिल्ली उसके पीछे भागे
दौड़े भागे उसके पीछे लेकिन पकड न पाए
पकड़ में आ जाये अगर तो उसको फिर खा जाये
खाने के बाद वो चाहे जल्दी से सो जाए


दबे पाँव वो आती है, दबे पाँव चली जाती
परेशां वो हरदम करती फिर भी सबको प्यारी
कोई उससे डरे, कोई उसे पुचकारे
लेकिन जग में प्यारो वो सबकी मौसी कहलाए

Saturday, October 30, 2010

मैं एक और जीवन जीना चाहती हूँ
उन्मुक्त आसमान मैं विचरण करती,
हवाओं को चीरते हुए डाल डाल डोलती
पंख पसारे धरती को छोड़ आसमान पाना चाहती हूँ
मैं एक और जीवन जीना चाहती हूँ ।

खुशबू बिखेर मन को बहलाती
काँटों की शैया पर लेटी मुस्कुराती
तोड़ मुझे माली से दूर
किसी के आँगन को सवारना चाहती हूँ
मैं एक और जीवन जीना चाहती हूँ ।

सीप की बंद पलकों मैं समाई
अनगिनत लहरों के बीच मैं लहराई
उन पलकों से बहार निकल
किसी के गले का हार बनाना चाहती हूँ
मैं एक और जीवन जीना चाहती हूँ ।

हर रात को रोशन करती
अदभुत से अनुभूति लोगों को कराती
एक चाँद के इर्द-गिर्द चमकना चाहती हूँ
मैं एक और जीवन जीना चाहती हूँ ।


- वाणी मेहता










Saturday, January 10, 2009

मैं वाणी हूँ

मैं वाणी हूँ...
मैं आधार हूँ, अधिकार भी हूँ,
मैं जननी अनगिनत शब्दों की,
मैं कर्कशा तो कभी मिठास भी,
मैं बेसुरी तो कभी सुरमयी भी
मुझे जानते सभी,मुझसे है सृष्टि यही,
जो अपमान करो तो करती विनाश हूँ,
जो विचार करो तो लाती खुशहाली हूँ,
मैं बुध्दि की संगिनी तो शत्रु भी हूँ
मैं घर घर में समाई हूँ
नही जिस घर, उसमे उदासी छाती
मुझ पे सरस्वती विराजती
मुझसे दुनिया है चलती
फिर क्यों सूझ बूझ खो कर हर इंसान करवाहट जीवन में घोल रहा है,
क्यों बे वजह मुँह से बोल रहा है?
क्यों प्यार नहीं इस दुनिया में?
क्यों मन उदास और व्याकुल है?
क्यों दिल पे तीरों का आघात है
वजह मैं ही तो हूँ ,जो बुध्दि की संगिनी तो शत्रु भी हूँ
मैं वाणी हूँ
जो मिठास जीवन में घोलती, जब बुध्दि मेरे साथ,
जो उजाड़ दे ज़िन्दगी, जब बुध्दि चले उल्टे पाव

शहरों की दास्ताँ

एक शहर ऐसा भी था
जहाँ चमचमाती रोशनी तो थी
पर अँधेरी ज़िन्दगी थी
जहां भीड़ में हर इंसान गुम हो चुका था
जहाँ दर्द, प्रेम जैसी भावनायें विलुप्त हो गयी थी
सिर्फ नकली चकाचोंधनी थी

एक शहर ऐसा भी था,
जो अपनेआप में जी रहा था
जाती संप्रदाय के झगडों में लोट-पोट हो रहा था
जहाँ भाषा एक अभिशाप बन रही थी
जहाँ प्यार होते हुए भी अलगाव था


एक शहर ऐसा भी था,
जो अपनी छवि सुधारने मे लगा था
जहाँ परस्पर प्यार तो था
पर राजनैतिक वातावरण छाया था
जहाँ माँगे हुए वोटो का असर कभी दिखता ही नही था

हर शहर में, एक अलग भीड़ नज़र आती है
हर शहर अपनी दास्तां खुद लिखता है
कोई गुलाल के रंगो में रंगा हैं
तो कोई खून की होली खेल रहा है
कोई जाति के दंगे फ़साद झेल रहा है
तो कोई बाबरी मज़्ज़िद के मुद्दे उखेड़ रहा है

शहर क्या होता है- हम लोगो का बसेरा
हम लोगों का डेरा
हम ही शहरों को आबाद करते हैं
और हम ही इन्हें बर्बाद कर देते हैं
हम वो गंदगी फैलाते हैं, जिन्हे चन्द लोग सिर्फ़ मन में सॉफ करते हैं

करना होगा , आगे बढ़ना होगा
एक नई सुबह का नही-अभी और आज में जीना होगा
वो प्यार फलाना होगा
जहाँ कोई जाति नही....कोई मज़हब नही....कोई भाषा नही...
सिर्फ़ प्यार का साम्राज्य होगा
ऐसे शहर को मिलकर हमे बनाना होगा
- वाणी मेहता